झरोखा न्‍यूज:  काकोरी रेल
डकै‍ती में इस्‍तेमाल की गई चंद्रशेखर आजाद की माउजर आज के एसके47 से कम नहीं थी। इस लूट कांड में जर्मनी निर्मित ऐसे चार माउजर प्रयोग किए गए थे।
अंग्रेजी सरकार की गजट के मुताबिक इन क्रांतिकारियों के पास चार माउजर थे। जिनके बट में कुंदा लगा लेने से वह छोटी ऑटोमेटिक रायफल की भांति लगता था। इस माउजरों की मारक क्षमता भी आज एके47 की तरह थी। और इन्‍हीं माउजरों में से एक चंद्रशेखर आजाद के अंतिम सांस तक उनके साथ रही, जिससे अंग्रेज खौफ खाते थे।

उत्‍सुकता में चल गई गोली और मारा गया बेकसूर

काकोरी लूट कांड के वक्‍त मन्‍मथनाथ गुप्‍त ने उत्‍सुकतावश माउजर का ट्रैगर दबा दिया, जिससे निकली गोली अहमद अली नाम के मुसाफिर को लग गयी और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया। हड़बड़ी में क्रांतिकारियों की एक चादर वहीं छूट गई। और यह खबर अगले ही दिन खबरों और रेडियो के जरिए पूरे देश में फैल गई।
लखनऊ के जीपीओ पार्क में चला मुकदमा
contact for advertisement खुफिया प्रमुख खान बहादुर तसद्दुक हुसैन ने पूरी छानबीन के बाद अंग्रेज सरकार को बताया कि काकोरी ट्रेन लूट क्रांतिकारियों का एक सुनियोजित षड्यंत्र था। इनकी गिरफ्तारी के लिए जगह-जगह पोस्‍ट लगवा दिए गए। इस बीच चादर पर लगे धोबी के निशान से इस बात की जानकारी मिली कि यह चादर शाहजहांपुर के किसी व्‍यक्‍ति की है। पूछताछ में पता चला कि यह चादर बनारसी लाल की है।  26 सितंबर 1925 की रात बिस्मिल के साथ ही देशभर से 40 लोगों को गिरफ्तार कर उनपर मुकदमा चलाया गया। जबकि, चंद्रशेखर आजाद सहित पांच लोगों को फरार घोषित किया गया। इन सभी क्रांतिकारियों के खिलाफ लखनऊ के जीपीओ पार्क में मुकदमा चलाया गया। तब जीपीओ अंग्रेजों का रिंकथिएटर हुआ करता था।
(-काकोरी कांड की से जुड़ी कहानी पढ़ें अलगी पोस्‍ट में 11 अगस्‍त को)

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