अमृतसर से प्रियांशू मिश्र की स्‍पेशल रिपोर्ट # यूं तो अमृतसर स्‍वर्णमंदिर और जलियांवाला बाग के रूप में जग प्रसिद्ध है।  लेकिन यहां कि धार्मिक महत्‍ता को और प्रगाढ़ बनाता है दुर्ग्‍याणा तीर्थ। पंजाब अपने खान-पान और तीज-त्‍योहारों के लिए भी जाना जाता है, लकिन शारदीय नवरात्र में गुरु नगर अमृतसर की सुबह और शाम इसे अन्‍य शहरों और नगरों से खास बनाती है। वह है यहां का विश्‍वप्रसिद्ध लंगूरों का मेला। यह मेला नवरात्र के पहले दिन से विजयदश्‍मी तक चलता है। जिसे देखने के लिए देश-विदेश से लोग यहां पहुंचते हैं
दुर्ग्‍याणा मंदिर के साथ ही बड़ा हनुमान मंदिर है।  इस मंदिर परिसर में एक बरगद का पेड़ है। जिसके बारे में कहा जाता है कि जब भगवान श्री राम ने अश्‍वमेघ का घोड़ा छोड़ा था जिसे पकड़ लिया था जिसे पकड़ कर लव कुश ने बांध दिया था। इसके बाद हुए युद्ध में लव कुश ने हनुमान जी को पकड़ कर इसी पेड़ में बांध दिया था। कहा जाता है कि यह बरगद का पेड़ और यहां प्रतिष्ठित स्‍वयंभू हनुमान की प्रतिमा उसी समय से है। इसी मान्‍यता के चलते हनुमान बने बच्‍चे अश्विन नवरात्र में सुबह शाम पूजा अचर्ना करने आते हैं।

बच्‍चों को लंगूर बनाने के पीछे की मान्‍यता
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वैसे तो हमारा देश मान्‍यताओं और परंपराओं का देश है।  क्‍वार के नवरात्रों में बच्‍चों को लंगूर बनाने के लिए मान्‍यता है कि जिन दंपति को संतान नहीं होती वह बड़ा हनुमान मंदिर में आकर मन्‍नत मांगते हैं। मन्‍नत पूरी होने पर वे अपने बच्‍चों को लंगूर बनाते हैं। लंगू बनने वाले बच्‍चों की उम्र की कोई बंदिश नहीं होती।

वैदिक मंत्रोच्‍चारण के साथ बनते हैं लंगू
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लंगूर बनने वाले बच्‍चों को नवरात्र के पहले दिन सुबह दुर्ग्‍याणा मंदिर लाया जाता है। यहां सरोवर में स्‍नान कराने के बाद बच्‍चों को वैदिक मंत्रों से आछादिकर उन्‍हें लंगूरी बना अर्थात लाल वस्‍त्र पहनाया जाता है। सिंदूर का टीका लगाया जाता है और इन बच्‍चों को बड़ा हनुमान मंदिर में माथा टेकवाया जाता है। लंगूर बनने वाले बच्‍चों शिुश से लेकर किशोर उम्र के बच्‍चे भी हो सकते हैं। जबकि इससे बड़ी उम्र के बच्‍चे बजरंगी बनते हैं। और ढोल नगाड़ों के साथ नाचते गाते दस दिन तक दोनों तक दोनो  समय  बड़ा हनुमान मंदिर तक जाते हैं।

देश-विदेश से लोग आते हैं बच्‍चों को लंगूर बनाने
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मंदिर प्रबंधन कमेटी के अध्‍यक्ष रमेश चंद्र शर्मा कहते हैं कि अश्विन माह के नवरात्र में प्रति वर्ष लगने वला लंगूरों के मेले में शामिल होने देशविदेश के हिंदूधर्मवलंबी आते है और अपने बच्‍चों को लंगूर बनाते हैं। शर्मा के मुताबिक इस वर्ष दस बच्‍चों के लंगूर और बजरंगी बनने की उम्‍मीद है। मंदिर कमेटी की तरफ से हर तरह के प्रबंध पूर कर लिए हैं। चाहे वह सुरक्षा से जुड़ा हो या फिर लंगूरों के रहखने खाने का प्रबंध।  उन्‍होंने कहा इस बार कुछ बजरंगियों के लिए कुछ गाइड लाइन जारी की गई है, जिनके मुताबिक 15 से कम आयु का बच्‍चा बजरंगी सेना में शामिल नहीं किया जाएगा। जबकि लंगूर कोई भी बन सकता है।


इन बातों का रखना होता है ध्‍यान
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लंगूर या बजरंगी बनने वाले बच्‍चों और युवाओं या उनके साथ रहने वालों को चाकू से कटा कोई फल या सब्‍जी नहीं खानी होती है। विजय दश्‍मी के दिन तक जमीन पर सोना होता है। नंगे पांव रहते हुए ब्रह्मर्चय व्रत का पालन करते हुए सुबह-शाम दुर्ग्‍याणा मंदिर स्थित बड़ा हनुमान मंदिर में शीश नवाने आना पड़ता है। विजय दशमी के दूसरे दिन लंगूर बने बच्‍चों को रामतीरथ ले जाया जाता है और वहां पर स्‍नान और भगवान वाल्‍मीकि के पूजा के बाद बच्‍चे अपने मूल स्‍वरूप में आते हैं।

दुकानदारों और ढोलवालों को भी रहता है इंतजार
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लगूंर बनने वाले बच्‍चों के लिए दुर्ग्‍याणा मंदिर के आसपास के दुकानदर नवरात्र शुरू होने से करीब एक माह पहले ही लंगूरी बानें तैयार करने में जुट जाते हैं। कुछ यही हाल ढोल वालों को भी होता है। यहां के दुकानदरों का कहना है उन्‍हें पूरे साल लंगूरों के मेले का इंतजार रहता है। पूरे दस दिन तक गरु नगर ढोल और राम नाम से गुलजार रहती है। लंगूर मेले से एक तरफ जहां लोगों की आस्‍था जुड़ी होती है वहीं यहां के लोगों रोजगार भी मिलता है।

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